शशी कुमार केसवानी
के साथ फिल्मी फ्राईडे
बॉलीवुड फिल्में विलेन के बिना अधूरी मानी जाती हैं और ये चलन 60 के दशक से चलता आ रहा है। खासकर 80 और 90 के दशक में विलेन का किरदार उतना ही दमदार होता था, जितना फिल्म के हीरो का होता था। बॉलीवुड में एक से बढ़कर एक विलेन हुये हैं, लेकिन डैनी डेन्जोंगपा की बात ही अलग है। 80 और 90 के दशक की बॉलीवुड फिल्मों में डैनी अपनी खूंखार एक्टिंग से फिल्म के हीरो को भी दहशत में डाल देते थे। डैनी ने फिल्म के हीरो से पंगा लेने से लेकर स्मगलिंग और करने तक वो सब काम किया जो उस दौर में हिंदी फिल्मों के विलेन किया करते थे। फिल्मों में खूंखार नजर आने वाले डैनी असल जिंदगी में बेहद सरल स्वभाव के शख्स हैं। डैनी डेन्जोंगपा का जन्म 25 फरवरी, 1948 को सिक्किम के युकसोम में हुआ था। उनका पूरा नाम शेरिंग फिनसो डेंजोंग्पा हैं। डैनी भुटिया जाति से संबंध रखते हैं और भुटिया ही उनकी मातृभाषा भी है। उन्होंने अपनी पढ़ाई नैनीताल के बिरला विद्या मंदिर स्कूल से की है, जबकि दार्जीलिंग के सेंट जोसेफ कॉलेज से कॉलेज ग्रेजुएशन की है।
डैनी का असली नाम शेरिंग फिंटसो डेन्जोंगपा है। नाम डिफिकल्ट होने की वजह से सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन ने उनका नाम बदलकर डैनी कर दिया था।
जया, डैनी की कॉलेज फ्रेंड थीं, जिन्होंने डैनी का इंडस्ट्री में बहुत साथ दिया है। वैसे, क्या आपको पता है कि लोगों पर अपने अभिनय का चार्म चलाने वाले डैनी का सपना एक्टर बनना नहीं था। जी हां, डैनी एक्टर नहीं बल्कि आर्मी में भर्ती होना चाहते थे। लेकिन उनकी मां डैनी इसके सख्त खिलाफ थीं। उनकी मां चाहती थीं कि उनका बेटा आर्मी में जाने की बजाय, आर्टिस्टिक बने। एक इंटरव्यू में डैनी ने बताया था, ‘आर्मी जॉइन करने से मना किए जाने के बाद मैंने ऋळकक जॉइन किया, जहां म्यूजिक और सिंगिंग कोर्स का एक पार्ट था। उस वक्त मैंने देश के कई मशहूर सिंगर आशा भोंसले, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे सिंगर्स के साथ गाना गाया था। इसके बाद मैं एक सिंगर बनना चाहता था, लेकिन बाद में मुझे पता चला कि म्यूजिक सिर्फ कोर्स का पार्ट था। कोर्स सिर्फ एक्टिंग के लिए बेस्ड था।’ फिर क्या था, डैनी ने सिंगिंग छोड़ एक्टिंग में हाथ आजमाया।
डैनी डेन्जोंगपा ने साल 1971 में बीआर इशरा की फिल्म जरूरत से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इस फिल्म में उन्होंने हीरो-हीरोइन के दोस्त डैनी का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्हें गुलजार की फिल्म मेरे अपने (1971) में बड़ा ब्रेक मिला। लेकिन बी। आर। चोपरा की फिल्म धुन (1973) में अहम भूमिका निभा कर उन्हें असल पहचान मिली। 70 के दशक में डैनी कई फिल्मों में बतौर सेकेंड लीड पॉजिटिव रोल में दिखाई दिए। इस दौरान फकीरा, चोर मचा शोर, देवता, कालीचरण, बुलंदी और अधिकार जैसी फिल्मों में उन्होंने सकारात्मक किरदार भी निभाये हैं। साल 1975 में रमेश सिप्पी ने डैनी को ही गब्बर सिंह का रोल आॅफर किया, लेकिन डेट्स नहीं होने की वजह वो ये रोल नहीं कर सके। फिर अमजद खान ने गब्बर सिंह के किरदार को हिंदी सिनेमा इतिहास में अमर कर दिया। इसके बाद उन्हें बड़े बजट की फिल्मों आशिक हूं बहारों का, पापी, बंदिश, द बर्निंग ट्रेन और चुनौती में नेगेटिव रोल्स निभाने को मिले और डैनी खलनायक के तौर पर मशहूर हो गए। इस दौरान उन्होंने बतौर विलेन कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया और डैनी के विलेन वाले रोल भी यादगार बन गये। फिर वो कत्या हो, बख़्तावर हो या फिर अग्निपथ का असली कांचा चीना।
70 के दशक में परवीन बॉबी और डैनी का प्यार खूब परवान चढ़ा था। डैनी, परवीन का पहला प्यार थे, जिनसे वह बेहद प्यार करती थीं। दोनों की पहली मुलाकात फिल्म धुएं की लकीर के सेट पर हुई थी। यहीं से दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और वे एक-दूसरे को डेट करने लगे थे। हालांकि, बात सिर्फ डेट करने तक सीमित नहीं थी। परवीन और डैनी उस वक्त बिना शादी किए लिव इन रिलेशनशिप में रहते थे। परवीन की मानसिक बीमारी की शुरूआत डैनी के साथ रिलेशन में रहते ही शुरू हो गई थी। इस दौरान वह अमिताभ को अपना दुश्मन मानने लगी थीं और जब अमिताभ ने एक मैग्जीन में डैनी को अपना दोस्त बता दिया तो वह डैनी को अमिताभ का एजेंट समझ कर दूर होने लगी थीं। 70 और 80 के दशक की बोल्ड एंड ब्यूटीफुल एक्ट्रेस परवीन बाबी टाइम मैगजीन के कवर पर छपने वाली पहली इंडियन एक्ट्रेस थीं। परवीन के बिंदास लुक और नेचर के कारण उनकी तरफ तीन एक्टर्स का झुकाव सबसे ज्यादा था। इसमें डैनी, कबीर बेदी और फिर महेश भट्ट शामिल थे। खास बात ये थी कि परवीन का जब भी किसी से ब्रेकअप तो वह उससे अपनी दोस्ती नहीं तोड़ी थी। डैनी से ब्रेकअप के बाद परवीन को धक्का काफी लगा था, लेकिन वह अंत तक उनकी दोस्त बनी रहीं और इसका सबूत वह कुछ ऐसे देती थीं डैनी भी हैरान रह जाते थे। हालांकि, 4 सालों तक एक-दूसरे को डेट करने के बाद दोनों ने अपनी राहें जुदा कर लीं। लेकिन, वे फिर भी एक अच्छे दोस्त थे।
कहा जाता है कि परवीन बॉबी डैनी से बेइंतहा प्यार करती थीं। अलग होने के बाद भी वह उन्हें खोना नहीं चाहती थीं। इसलिए उन्होंने ब्रेकअप के बाद दोस्ती का रिश्ता बनाए रखा। परवीन अक्सर डैनी के घर बिना बताए आ जाया करती थीं, जिसकी वजह से उनकी गर्लफ्रेंड किम को काफी परेशानी होती थी। इस बात का खुलासा खुद डैनी ने फिल्मफेयर में कहा। डैनी ने कहा था, चार सालों तक एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में रहने के बाद मैंने किम को डेट करना शुरू किया, तो वहीं परवीन ने कबीर बेदी को। वह अक्सर मेरे घर आती रहती थी और हम भी उसके घर जाया करते थे। डैनी ने बॉलीवुड इंडस्ट्री में अपने अभिनय का लोहा मनवाने के बाद साल 1990 में सिक्किम की राजकुमारी गावा से शादी कर ली। शादी के बाद उनके दो बच्चे रिनजिंग डेन्जोंगपा और पेमा डेन्जोंगपा हैं। उनकी बेटी बिल्कुल अपनी मां गांव जैसी दिखती है। डैनी के बेटे भी अपने पिता की तरह फिल्मों में नाम कमाना चाहते हैं। 73 साल के डैनी को हाल ही में कंगना रनौत की फिल्म मणिकर्निका में देखा गया था। उन्होंने अपने करियर में करीब 190 फिल्में की हैं। साथ ही साथ फिल्म इंडस्ट्री में अपना एक अलग मुकाम बनाकर रखा। आज भी मुंबई में अनेकों निर्माता-निर्देशकों के अच्छे रिश्ते है। जिसके कारण कई फिल्मों का आॅफर भी रहता है पर अपनी शर्ताें पर काम करने वाले डैनी कहते है। अच्छा काम होगा तो जरूर करूंगा हर कुछ तो नहीं करूंगा।
हिंदी सिनेमा में डैनी की प्रमुख फिल्मों में ‘मेरे अपने’ (1971), ‘धुंध’ (1973), ‘चोर मचाए शोर’ (1974), ‘खोटे सिक्के’ (1974), ‘काला सोना’ (1975), ‘लैला मजनूं’ (1976), ‘फकीरा’ (1976), ‘कालीचरण’ (1976), ‘संग्राम’ (1976), ‘अब्दुल्लाह’ (1980), ‘बुलंदी’ (1981), ‘कानून क्या करेगा’ (1984), ‘युद्ध’ (1985), ‘ऐतबार’ (1985), ‘प्यार झुकता नहीं’ (1985), ‘यतीम’ (1989), ‘सनम बेवफा’ (1991), ‘अग्निपथ’ (1990), ‘हम’ (1991), ‘खुदा गवाह’ (1992), ‘घातक’ (1996) ‘चाइना गेट’ (1998) ‘पुकार’ (2000), ’16 दिसम्बर’ (2002) ‘रोबोट’ (2010) शामिल हैं।
बंगले के अंदर जाने के बाद उन्होंने मोहन कुमार से मुलाकात तो की, लेकिन जैसे ही उन्होंने मोहन कुमार के सामने अपने एक्टर बनने की इच्छा रखी। मोहन उनपर जोर-जोर से हंसने लगे। मोहन कुमार ने उन्हें अपने बंगले के गार्ड की नौकरी आॅफर की। उस दिन डैनी ने खुद से ये वादा किया कि एक दिन वो मोहन कुमार के बंगले के बगल में अपना बंगला बनाएंगे। वक्त गुजरता गया और डैनी सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए, लेकिन उन्हें खुद से किया अपना वादा याद था। आखिरकार उन्होंने मोहन कुमार के बंगले के बगल वाली जमीन को खरीद उसपर खुद का बंगला बनवाया। बुद्धिष्ट परिवार में जन्मे डैनी ने बिरला विद्या मंदिर और सेंट जोसफ कॉलेज, दार्जिलिंग से अपनी पढ़ाई पूरी की। डैनी का विवाह गंगटोक की गावा डेन्जोंगपा से हुआ। अपने बेहतरीन अभिनय से दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा करने वाले डैनी को 2003 में पद्मश्री से नवाजा जा चुका है।
यह बात है सन 1992 की मैं मुंबई से बैंगलौर जा रहा था तभी फ्लाइट में ही मेरी मुलाकात हुई थी तब मेरे को बताया था कि मेरा बियर का भी कारोबार है। तब सुनके मेरे को बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन जब उन्होंने विस्तार पूर्वक बताया तो मेरे को लगा कि ये अपने व्यवसाय को भी बहुत गंभीरता से करते है। उसके बाद बैंगलौर के जिस होटल में ठहरे थे। वहां मेरे को बुलाया तब उनके रहन-सहन के बारे में बहुत जानकारी मिली। डेनी अब भारत के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन बन चुके हैं। उनकी सिक्किम और ओडिशा में अपनी बियर ब्रेवरीज है, जिससे वे फिल्मों से भी ज्यादा पैसा कमा लेते है। इसी कारण आज डेनी के पास रेंज रोवर, आॅडी, मर्सडीज व अनेकों गाड़ियों के शौकीन है तथा दुनिया की महंगी घड़िया और महंगे कपड़े पहनने के शौकीन है। जैसी महंगी गाड़ियां है। यही नहीं मुंबई और सिक्किम दोनों जगह पर उनके अपने खुद के आलीशान घर हैं। हीमेन 9000 के नाम से व अन्य कई ब्रांड आते है। कारोबार में उनकी पत्नी जो सिक्किम की महारानी भी है और बेटी भी कारोबार में हाथ बटाती है।
कभी वे शिकार है, तो कभी शिकारी। कभी त्याग तथा बलिदान करने वाला दोस्त है। कभी दुश्मनी निभाने वाला क्रूर खलनायक है, तो कभी अपने वतन की रक्षा करने वाला देशभक्त सैनिक। अनेक फिल्में। अनेक चेहरे और अनेक रंग में एक साथ जीते हुए उसे देखा और महसूस किया जा सकता है। धुंध फिल्म के बाद डैनी को उसी तरह के अनेक रोल आॅफर किए , लेकिन प्रत्येक आॅफर सोचकर समझकर फैसला वे लेते रहे। उन्हें पुराने दिग्गज दिलीप कुमार और आमिर खान की तरह रोल पसंद करने के मामले में अपने चूजी को बनाया। कम काम और बेहतर परिणाम यह डैनी की सफलता का मूलमंत्र रहा है।





