
शशी कुमार केशवानी
अगस्त 1947 में भारत विभाजन के वक्त पंजाबियों को आधे से ज्यादा पंजाब मिला, बंगलियों को आधे ज्यादा बंगाल मिला, जबकि बिहारियों के पास बिहार था ,मराठों के पास महाराष्ट्र था। गुजरातीयों के पास पूरा गुजरात था, याने सभी के पास कुछ न कुछ था केवल सिन्धीयो ने अपना धर्म भाषा बचाने के लिए सब कुछ कुर्बान किया। राज्य तो छोड़िए एक शहर तक नही मिला,
केवल सिन्धियों को आधा सिंध तो क्या उसका एक टुकड़ा तक तक नहीं मिला और पूरा ‘सिन्ध प्रदेश’ सरहद के उस पार चला गया। अपनी मातृ भूमि से बेदखल सिन्धियों को आज़ाद भारत में कोई ऐसी जगह नहीं मिल सकी जिसे वे सिंधी प्रांत (राज्य) कह सके।
26 जनवरी 1950 को हिन्दुस्तान का संविधान लागू हुआ। जिसकी आठवीं अनुसूची में 14 भाषाओं को शामिल किया गया लेकिन सिन्धी भाषा जो उसे संविधान की आठवीं अनुसूची की 14 भाषाओं में शामिल नहीं किया गया।
आजादी के 20 साल के कड़े संघर्ष के बाद संविधान के 21 वें संशोधन में 10 अप्रैल 1967 को संविधान की आठवीं अनुसूची में सिन्धी को 15 वीं भाषा के रूप में शामिल किया गया।जिसके लिए बहुत संघर्ष व सरकार से लड़ाई लड़नी पड़ी थी।
7 अप्रैल 1967 को सिंधी भाषा बिल लोकसभा में पास होने के बाद, 8 तारीख (शनिवार) और 9 अप्रैल (रविवार) सभी सरकारी दफ्तर बंद थे। 10 अप्रैल 1967 को चेटीचंड पर्व का दिन था। समाज के सभी साहित्यकारो राजनीतिक सामाजिक कार्यकरताओं की मेहनत से
10 अप्रैल 1967 को राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्ण जी ने बिल पर हस्ताक्षर किए और चेटीचण्ड महोत्सव पर सिंधी समुदाय को यह अपना अधिकार मिला
इसी वजह से सिंधी समुदाय के लिए 10 अप्रैल 1967 का दिन एक एतिहासिक दिन था। जिसे आज भी उत्साह पूर्वक मनाना चाहिए इस संघर्ष के लिए जिन्हे सैल्यूट करना चाहिए उनके नाम लेन तो जरूरी है।
प्रो राम पंजवानी भोजराज नागरानी जयरामदास दौलतराम गोविंद माली किरत बाबानी लक्ष्मण दास केसवानी पोपटी हिरानंदानी उत्तम ए जे और भी हजारों-हजार सिन्धीयों ने संघर्ष से अपना अधिकार लिया।






