फिल्मी फ्राइडे/ शशी कुमार केसवानी
नमस्कार दोस्तों, आज बात करते हैं एक ऐसे अभिनेता की जिसका अभिनय तो शानदार है ही सही, पर उस अभिनेता की आंखें भी बहुत कुछ बोलती हैं। चेहरें की भाव भंगिमाएं उस ऊंचाई तक जाती हैं, जहां कोई अव्वल दर्जे का अभिनेता ही पहुंच पाता है। क्योंकि यह एक जुनूनी कालाकार है इसलिए अपने हर अभिनय को अंतिम सीमा तक लेकर जाता है। जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं मेरे प्रिय कलाकार व हर दिल अजीज मप्र के सागर निवासी गोविंद नामदेव की। जिन्होंने अपने परिवार का परंपरागत व्यवसाय छोड़कर अभिनय की दुनिया में कदम रखा और दुनियाभर में नाटकों के जरिए अपनी पहचान बनाई। एनएसडी में बड़ी परेशिानियां झेली, अंग्रेजी में हाथ तंग होने की वजह से कई बार क्लास से बाहर ही बैठे रहते थे। एक बार इब्राहिम अलकादी ने पूछा तो कहा कि हमे यह भाषा समझ ही नहीं आती। तब उन्होंने सलाह दी की इसके अलावा भी बहुत सी चीजें है, योगा, मेकअप, डायरेक्शन ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जिन्हें सीखों। अलकादी की एक सलाह ने उनका जीवन ही बदल दिया। बाद में उन्होंने धर्मवीर भारती का नाटक अंधा युग से अपने अभिनय की एक अलग पहचान बनाई। बाद में सेक्सप्रियर के कई नाटक किए। एनएसडी के जमाने में ही गर्मियों में मर कैंप लगता था। वहीं पर मथुरा की सुधा अपनी बहन के बच्चे को लेने आती थी। गोविंद की उनसे मुलाकात हुई और सन 1980 में दोनों विवाह बंधन में बंध गए। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आगे समय-समय पर करते रहेंगे। जानिए उनके कुछ अनछुए पहलुओं पर।
‘ठाकुर वक्त के हिसाब से नहीं चलते, वक्त ठाकुर के हिसाब से चलता है…’ ‘विरासत’ मूवी का ये डायलॉग याद दिलाता है गोविंद नामदेव की। बॉलीवुड का एक ऐसा एक्टर, जिसकी एक्टिंग जानदार है और आवाज शानदार। ज्यादातर फिल्मों में इंस्पेक्टर और विलेन के किरदार में नजर आए। हैरानी की बात ये है कि उन्होंने जानबूझकर निगेटिव रोल ही किए। उन्होंने डेविड धवन की ‘शोला और शबनम’ (1992) मूवी से सिनेमा की चमक-धमक की दुनिया में कदम रखा, लेकिन इससे पहले करीब 11 साल तक थियेटर की दुनिया पर राज किया। मध्य प्रदेश के सागर में जन्में गोविंद जब छठवीं क्लास में थे, तब महात्मा गांधी के विचारों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने बड़ा आदमी बनने की ठानी और उनकी यही जिद उन्हें इस मुकाम तक लेकर आई, जहां वो आज हैं। गोविंद नामदेव का जन्म 3 सितंबर 1954 को सागर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता भगवान के कपड़े डिजाइन करने और सिलने का काम करते थे। ये उनके घर का पुश्तैनी काम था। 10 भाई-बहनों में गोविंद चौथे नंबर पर थे। उनके अंदर बचपन से ही अव्वल आने की जिद थी। फिर चाहे वो पढ़ाई हो या फिर खेल। आपको जानकर हैरानी होगी कि वो गिल्ली डंडा या कंचा खेलने से पहले प्रैक्टिस किया करते थे, ताकि जब वो बाकी बच्चों के साथ खेलें तो उन्हें हरा सकें।
गोविंद नामदेव बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों में से एक हैं, जो पर्दे पर अपनी अलग तरह की एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर की ज्यादातर फिल्मों में विलेन के रोल किए हैं।एक बातचीत के दौरान गोविंद नामदेव ने कहा, ‘मैंने पर्दे पर जितने दुष्कर्म किए, हत्या की, बदसलूकी की, उतना ही मैं अपने परिवार के करीब होता गया। फिल्मों और निगेटिव किरदारों ने मुझे पॉजिटिव तरीके से बदल दिया है। फिल्मों में आने से पहले मैं बहुत अलग इंसान था। मैं वह व्यक्ति नहीं था जो मैं आज हूं। मैं बहुत ही गुस्से वाला और आक्रामक युवा लड़का था। हालांकि, जैसा कि मैंने स्क्रीन पर ज्यादा से ज्यादा निगेटिव रोल किए, मैंने अपने व्यक्तित्व में बदलाव देखा।’
गोविंद नामदेव ने आगे कहा, जब भी मैंने किसी की हत्या, या किसी के साथ दुष्कर्म जैसे बहुत गहन निगेटिव सीन शूट किए, तो मैं अपनी पत्नी और बच्चों को पहले से भी ज्यादा प्यार करता था। क्योंकि किसी के इतने क्रूर होने की सोच मुझे लगातार उकसाती थी। मैं खुद से सवाल करता था कि कोई इतना बुरा कैसे हो सकता है कि दुष्कर्म या अपराध कर सकता है।’ गोविंद नामदेव ने यह भी बताया कि उनकी आॅनस्क्रीन भूमिकाओं ने उनके अपने रिश्तेदारों को उनसे बात करने के लिए प्रेरित किया है। इसके अलावा दिग्गज अभिनेता ने और भी ढेर सारी बातें की हैं। पॉपुलर सीनियर एक्टर गोविंद नामदेव ने बॉलीवुड से लेकर साउथ और मराठी फिल्मों में शोहरत हासिल किया है। उन्होंने फिल्मों के अलावा थिएटर में भी काम किया है। वह फिल्म इंडस्ट्री में अपने विचारों के लिए फेमस हैं और कई यादगार किरदार निभाए हैं। उन्होंने हमेशा एक रियल पर्सन के रोल को निभाने में दिलचस्पी दिखाई है। गोविंद का कहना है कि उन्होंने लोगों में उनके गुणों को देखकर उसपर बारीकी से काम किया है, जिसके बाद वो अपने कैरेक्टर में रियल पर्सन दिखते हैं। गोविंद नामदेव ने फिल्म ओएमजी में सिद्धेश्वर महाराज के रोल को अपने साथ बचपन की घटना एक से जोड़ा है।
दोस्तो के साथ झील पर करते थे मस्ती- जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है ठीक उसी तरीके से बचपन में एक साधु ने उन्हें झील से पानी पीने के लिए पीटा था। गोविंद नामदेव अपने बचपन की एक स्टोरी शेयर करते हुए बताया, ओ माय गॉड में मैंने जो रोल प्ले किया है, वैसा इंसान मैंने बचपन में देखा था। जब मैं 10-11 साल का था तो दोस्तों के ग्रुप के साथ संडे को नदी के किनारे जाकर मस्ती करते थे। वहां सभी बैठकर अमरुद तोड़ते, घास जलाकर मूंगफली चना भूनते, नदी किनारे बैठकर खाते, पानी पीते और खूब मस्ती करते थे। एक दिन, एक साधु ने हमें डांटते हुए कहा मैं इस पानी का इस्तेमाल अपने शिवलिंग को नहलाने के लिए करता हूं। इस पानी को गंदा करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? साधु बाबा ने की छड़ी से पिटाई- गोविंद ने आगे कहा, बाबा ने हमें दोबारा ऐसा ना करने के लिए कहा। कुछ दिनों बाद मैं वहां से पानी पी रहा था तो एक हाथ ने मेरी गर्दन पकड़ी और मुझे पीछे खींच लिया। उसके बाद उन्होंने गुस्से में आंखें लाल करके छड़ी से मेरी पिटाई की। गोविंद ने बताया कि उन्हें जब ये रोल मिला तो उनके मन में सबसे पहले उसी बाबा की तस्वीर सामने आई। गोविंद के वर्कफ्रोंट की बात करें तो वो हाल ही में आजम और चिड़ियाखाना में नजर आए थे।
पहली ही फिल्म के बाद लिया था बड़ा फैसला
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता गोविंद नामदेव अपनी दमदार अभिनय के दम पर फिल्मों में सक्रिय हैं। गोविंद नामदेव ने एक बातचीत के दौरान बताया था कि चुनौतियां तो हर क्षेत्र में होती हैं, लेकिन उनके करियर में कभी कोई ऐसा मोड़ नहीं आया, जिसमें उन्हें अधिक संघर्ष करने की जरूरत पड़ी हो। वह कहते हैं कि एक्टर बनने से पहले उन्होंने खुद को उस लायक बनाया। उन्होंने पहले एनएसडी से अभिनय के गुर सीखे, फिर दिल्ली में ही रहकर 11 सालों तक खुद को इसके लायक बनाया और जब वक्त आया तो वह मुंबई की ओर अपना रुख कर दिए। गोविंद बताते हैं कि मुंबई आने के बाद उन्हें ज्यादा स्ट्रगल करने की जरूरत नहीं पड़ी और उन्हें उनकी पहली फिल्म शोला और शबनम मिल गई, चूंकि पहले से ही कई लोग गोविंद के अभिनय से परिचित थे, इसलिए उनका चेहरा ही काफी था। बता दें, गोविंद ने खुद को एक्टर बनाने के लिए ऐसा ढाला था कि उनकी एक्टिंग नहीं, बल्कि लोग उनका चेहरा देखकर समझ जाते थे कि वह एक मंझे हुए कलाकार हैं। गोविंद नामदेव कहते हैं कि जब वह अपनी पहली फिल्म शोला और शबनम (जो सिनेमाघरों में 1992 में रिलीज हुई थी) की शूटिंग कर रहे थे, तो इस फिल्म में उनके को-स्टार महावीर शाह ने एक बार गोविंद से कहा कि वह उनकी 25वीं फिल्म है और इन सभी फिल्मों में उन्होंने सिर्फ पुलिस इंस्पेक्टर का ही रोल किया है। ऐसा क्यों? पूछने पर महावीर ने गोविंद को बताया कि वह इसी किरदार में फिट बैठते हैं, तो इसलिए उन्हें कोई दूसरा किरदार आॅफर ही नहीं करता। यह बात सुनकर गोविंद बहुत घबरा गए और उन्होंने तभी तय कर लिया कि वह इस फिल्म के बाद इंस्पेक्टर का रोल नहीं करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए, क्योंकि ऐसा करने से वह फंस जाएंगे। कुछ इस तरह के विचार गोविंद के मन में उस वक्त आ रहे थे। गोविंद आगे बताते हैं, फिल्म रिलीज हुई, हिट भी हुई? लोगों ने उनके काम को बहुत सराहा, लेकिन फिर वही हुआ। उनके पास इंस्पेक्टर के ही रोल आने लगे और फिर वह थोड़ा घबराने लगे। फिर उन्होंने इसके एक फिल्म की, जिसमें उन्होंने इंस्पेक्टर का किरदार निभाया, क्योंकि उस फिल्म में उनके किरदार का अच्छा इंपेक्ट था। इसके बाद भी उनके पास इसी रोल के लिए आॅफर आते चले गए और धीर-धीरे गोविंद मना करते चले गए। फिर इंडस्ट्री में ऐसी अफवाहें उड़ने लगी कि वह थोड़े घमड़ी किस्म के इंसान हैं, क्योंकि वह किसी भी बड़े प्रोड्यूसर को डारेक्ट रोल के लिए मना कर देते थे। फिर इस भ्रम को दूर करने के लिए खुद गोविंद सबसे मिलना-जुलना शुरू किए और इसी दौरान उनके हाथ लगी एक बड़ी प्रोजेक्ट। गोविंद के पास जब परिवर्तन के लिए आॅफर आएं, तो उन्होंने सोचा इसमें उन्हें किसी एक रोल के लिए आॅफर दिया जाएगा, लेकिन जब उन्होंने सुना की इस सीरियल की मुख्य भूमिका में वो हैं, तो इस आॅफर को एक्सेप्ट भी किए और इसके लिए काफी मेहनत भी की, इस सीरियल ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई, साथ ही लोगों ने देखा कि वह सिर्फ इंस्पेक्टर ही नहीं, हर तरह के रोल में फिट बैठ सकते हैं। इसके बाद से गोविंद की गाड़ी कभी नहीं रुकी और वह लगातार फिल्में करते ही जा रहे हैं।
पिता गाते थे रामायण, सपना पूरा करे के लिए घर-बार छोड़ा
गोविंद नामदेवबैंडिट क्वीन, विरासत, सरफरोश और सत्या जैसी फिल्मों में विलेन का रोल निभाकर दर्शकों के मन में दहशत भर दी थी। वे प्रेम चोपड़ा, अमरीश पुरी जैसे सितारों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। वे अपनी पहली फिल्म से दर्शकों का दिल जीतते आ रहे हैं। गोविंद के पिता जब रामायण का पाठ करते थे, तब वे भी शौक से गाते और मंजीरा बजाया करते थे।
गोविंद को महात्मा गांदी की जीवनी पढ़ने के बाद महान विभूतियों के बारे में जानने की इतनी तीव्र इच्छा हुई कि उन्होंने सरोजिनी नायडू, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे बड़े लोगों की जीवनियां पढ़ डाली और उनके जैसा बनने का प्रण किया। वे तब 8वीं कक्षा में थे। उनके मन में यह बात बैठ गई कि अगर सफल होना है, तो दिल्ली जैसे बड़े शहर जाकर पढ़ाई करनी होगी। उन्हें दिल्ली में अपने दोस्त के रिश्तेदार के बारे में पता चला। उन्होंने पढ़ाई छोड़ी और दिल्ली के लिए निकल पड़े।
जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहते थे गोविंद नामदेव- गोविंद ने ठान लिया था कि वे जो कुछ भी करेंगे, उसमें अपना 100 फीसदी देंगे। वे दिल्ली के 14 स्कूलों के जोन में 8वीं कक्षा की पढ़ाई में अव्वल आए। उन्हें स्कॉलरशिप मिली, जिससे उनके आगे की पढ़ाई आसानी से हो गई। उन्होंने एक्टर बनने के बारे में नहीं सोचा था, पर वह कुछ बड़ा करना चाहते थे जिससे उनकी एक पहचान बने। गोविंद जब 11वीं कक्षा में थे, तब उन्होंने नौकरी करने की सोची। एक दिन उनकी नजर नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा के विज्ञापन पर पड़ी, जिसमें 250 रुपये के स्कॉलरशिप का भी जिक्र था। उन्हें लगा कि इससे उनकी आगे की पढ़ाई हो जाएगी और वे कुछ नया सीख भी जाएंगे। उन्होंने फॉर्म भरा और वे चुन लिए गए। वे अनुपम खेर और सतीश कौशिक जैसे सितारों के साथ पढ़ाई कर रहे थे, हालांकि मुंबई का रुख करने से पहले उन्होंने अपनी एक्टिंग स्किल को और अच्छे से तराशा।
शोला और शबनम से किया बॉलीवुड डेब्यू- गोविंद फिल्मों में विलेन के रोल निभाने की मंशा से 1990 में मुंबई आए। उन्हें तीन महीने में केतन मेहता की फिल्म सरदार पटेल में काम मिल गया। उस दौरान, उनकी मुलाकात पहलाज निहलानी और डेविड धवन से हुई जो शोला और शबनम पर काम कर रहे थे। उन्हें इस फिल्म में इंस्पेक्टर का रोल मिला जो उनकी डेब्यू फिल्म साबित हुई।
गोविंद नामदेव ने हर तरह के रोल निभाए- गोविंद ने शुरू में पुलिस के रोल निभाए, पर टाइपकास्ट होने के डर से वे पुलिस का रोल निभाने से मना करने लगे। दरअसल, शोला और शबनम की शूटिंग के दौरान उनके कोस्टार महावीर शाह ने बताया कि वे 32 फिल्मों में इंस्पेक्टर का रोल निभा चुके हैं। उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा रोल नहीं मिलता। गोविंद उनके इस खुलासे से डर गए थे। उन्हें लगा कि कहीं वे भी इस चक्कर में न फंस जाएं। उन्होंने जीपी सिप्पी और राजन कोठारी जैसे लोगों की फिल्मों में काम करने से मना किया। लोगों ने उन्हें घमंडी समझा, पर उन्हें अलग तरह के रोल की तलाश थी जो प्रेम ग्रंथ और बैंडिट क्वीन से पूरी हुई। इसके बाद, उनकी ख्याति काफी बढ़ गई। उन्होंने सीरियलों में भी काम किया और बताया कि वे हर तरह के रोल निभाने में सक्षम हैं। वे 30 से ज्यादा सालों से एक्टिंग की दुनिया में सक्रिय हैं।






