शशी कुमार केसवानी

आप कल्पना करिए अगर एक घर टूट कर दो घर हो जाते हैं, तो हालात कितने खराब हो जाते हैं। इस बात से आप सभी किसी न किसी रूप में वाकिफ हैं। एक देश दो टुकड़े हो जाएं तो क्या हालात होते हैं, सोचकर ही रूह कांप जाती है। ऐसा ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान देखने को मिला था। हमें ज्यादा बातें यूं पता है कि मेरे पिता दादा लक्ष्मणदास केसवानी उस समय पाकिस्तान में ही थे। वहां से निकलने वाले सिंध आब्जर्वर के विशेष संवाददाता थे। जिन्ना से विवाद से बाद में उन्हें सरकार बल्लभ भाई पटेल ने इंडियन हाईकमीशन फील्ड आॅफिसर के पद पर नियुक्त कर दिया। जिन्होंने भारत आने लोगों के माइग्रेशन सर्टिफिकेट जिनकी मात्रा लगभग दो लाख थी, उन पर हस्ताक्षर किए थे। बंटवारे का दर्द उन्होंने आंखों से देखा था, जिस पर उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं, पर उन्होंने जो किस्से हमे बताए थे वह किस्से हमें ऐसे याद हैं, जैसे वह दर्द हमने ही झेला हो। सिंधी, पंजाबी, कच्छी लोगों ने जो दर्द देखा है, वह हर कल्पनाओं से बहुत अलग है। पंजाबियों के लिए पंजाब था, कच्छिओं के लिए गुजरात था, सिंधियों का दर्द यह था कि उनको एक अंजान देश में आकर रहना था। हालांकि वे इसी देश के थे। पर बिडंबना देखिए अपने देश में ही शरणार्थी होकर आ गए। अपनी जमीन जायजाद सबकुछ छोड़कर खाली हाथ आकर अपना धर्म, जाति, सभ्यता, संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए यह त्याग था। इस त्याग की भट्टी में तपकर सिंधी समाज ने भारत देश को इस तरह अपनाया जैसे यह देशन बना ही उनके लिए था। देश के कई लोगों ने सिंधियों को स्वीकार करने में लंबा समय लगाया। कई जगहों पर तो आज भी सिंधियों को यह दर्द झेलना पड़ता है। आज देश के कई शहरों को बसाने में सिंधी समाज का बड़ा योगदान है। देश में इंकमटैक्स देने वालों में भी बड़ा नाम है। पर कहीं न कहीं बंटवारे का जो दर्द है वह आज भी किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।  पर उस समय के कुछ किस्से, कुछ कहानियां आज भी याद आ जाती हैं। जिस पर कई लोगों ने काम भी किया है। कुछ काम हमने भी इस किया है, जो दर्द लोगों ने झेला था। जिस परेशानियों से सामना किया था उस पर हम समय-समय पर लोगों से बात करके आप जानकारी पहुंचाने की कोशिश करते हैं। आज भी वह दर्द ताजा हो जाता है। यहीं कारण है कि मेरे पिता मुनव्वर राणा का एक शेर हमेशा सुनाते थे। मुजाहिर हैं, मगर एक दुनिया छोड़कर आए हैं, तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं। कहानी का यह किस्सा आज तक सबने छुपाया है कि हम मिट्टी की खातिर अपना सोना छोड़ आए हैं। नई दुनिया बसा लेने की कमजोर चाहत में पुराने घर की दहलीज को सूना छोड़ आए हैं। अकीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बांधी थी, वो राखी छोड़ आए है, वो रिश्ता छोड़ आए हैं। ऐसे ही दर्द भरी दास्तां हर सख्श की अलग-अलग तरह से यादों में नजर आ ही जाती हैं। मेरा दिल ही दर्द से इतना भर आता है कि मैं तो यहीं पैदा हुआ पर लोगों के दर्द सुनकर मैं भी अकेला और डरा हुआ महसूस करता हूं। तो आईए जानते हैं। कुछ लोगों की दर्द भरी दास्तांने। यहां पर आपको बता दें कि सिंधी समाज ने महाराष्ट्र के कल्याण (उल्हासनगर) के अलावा भोपाल के बैरागढ़ जो मिलेट्री केंट हुआ करता था उसको भी एक अलग सिंधियों का क्षेत्र बना दिया। इसी तरह से अजमेर, उदयपुर, जयपुर  और गुजरात के कई शहरों के साथ-साथ देश विदेश में भी कई शहर बसाए हैं। पर अपनी मातृभूमि सिंध को पाकिस्तान वापस लेने के लिए आज भी कुछ संघर्ष की राह पर चल रहे हैं।

साल 1947 में भारत के विभाजन ने आजादी के जश्न को फीका कर दिया था। नई खींची गई सीमा की लकीर के दोनों तरफ दो नए राष्ट्र थे जो सांप्रदायिक दंगों में झुलस रहे थे। पंजाब और पश्चिम बंगाल के लोग खतरनाक यात्राएं करके इधर से उधर हो रहे थे। कभी ट्रेन से कभी वाहनों से और जिन्हें कुछ नहीं मिल रहा था वो पैदल ही सफर कर रहे थे। वहीं, सिंध से हजारों लोग नावों के जरिए मुंबई पहुंचे थे। सिंधी हिंदू कराची बंदरगाह पर इकट्ठा होते और जहाजों में सवार होकर भारत पहुंचते। इनमें से कई जहाज गुजरात के तटों पर भी रुके। नानिक मंगलानी और उनका परिवार ऐसे ही प्रवासियों में शामिल था। 75 साल के नानिक उस समय को याद करके भावुक हो जाते हैं। वो कहते हैं, ”मैं 1945 में पैदा हुआ था। उस वक्त मैं ढाई साल का था। उस दौर की यादें आज भी मेरे जहन में साफ हैं।”

नानिक बताते हैं, ”मेरे पिता एक किसान थे जो रातोडेरों के पास बुंगलडेरो में रहते थे। यह एक छोटा सा खूबसूरत गाँव था जहाँ खेत और पहाड़ियां थीं। वो खुशहाल दिन थे। लेकन आजादी के बाद सब बदल गया। कुछ सप्ताह बाद तो हालात इतने खराब हो गए कि हमारे परिवार को वहाँ से निकलना पड़ा। यह एक खतरनाक और डराने वाला सफर था।” लोगों की जिÞंदगियां रातों-रात बदल गई थी। घर और जमीन सब छिन गया था। वो सिर्फ़ अपने गाँव ही नहीं बल्कि सैकड़ों सालों की विरासत छोड़कर आए थे। कुछ दुख में डूबे हुए थे, कुछ थके हुए थे, कुछ खाली पेट थे और कुछ की नींद गायब थी। उन्हें भविष्य के बारे में कुछ पता नहीं था। वो अपने ही देश में बाहरी बन गए थे और अब नए देश में नया घर बनाने जा रहे थे।

इन सिंधी प्रवासियों के जहाज जब मुंबई के तट पर पहुंचे तो उनकी परेशानियों का अंत नहीं हुआ। उन्हें बसों और वाहनों में भरकर सायन और बोरीवली जैसी जगहों पर बनाए गए अस्थायी कैंपों में भेज दिया गया। यहाँ से उन्हें अंदरूनी भारत के आगे के सफर पर निकलना था। इनमें से बहुत से लोग पिंपरी, कोल्हापुर जैसी जगहों पर पहुंचे। बहुत से लोगों को मुंबई से 30 किलोमीटर दूर कल्याण कैंप में रखा गया था। जिन बैरकों में कभी ब्रितानी सिपाही रहते थे उन्हें सिंधी परिवारों ने अपना घर बना लिया था। बाद में ये बड़ी सिंधी कॉलोनियां बन गए। यहीं एक नया शहर बसा और फला-फूला।

कल्याण से उल्हासनगर
कल्याण और अंबरनाथ के बीच की जमीन पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी शासकों ने पाँच कैंप स्थापित किए थे। यह जगह उल्हास नदी के किनारे है और मुंबई को करजत से जोड़ने वाली व्यस्त रेलवे लाइन यहीं से गुजरती है जो आगे पुणे और फिर दक्षिण भारत के शहरों को जाती है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस जगह पर ब्रितानी एयर फोर्स ने भी अपना अड्डा बनाया था। पास के गाँव नेवाली में अभी भी हवाई पट्टियां मौजूद हैं। आज यहाँ एक शहर फल-फूल रहा है लेकिन अब से 70 साल पहले यह मुंबई महानगर से दूर एक अकेला शांत इलाका था।

उल्हासनगर के पूर्व मेयर हरदास माखीजा कहते हैं, ”उन दिनों हमारे पास बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थी। बिजली और पानी की सप्लाई की तो बात ही छोड़ दीजिए, हमारे यहां तो सड़कें तक नहीं थीं। सांप-बिच्छू घूमते रहते थे।” हरदास सिर्फ़ चार महीने के थे जब उनके पिता सनमुख माखीजा ने 1948 में सिंध को छोड़कर भारत आने का फै़सला किया। सनमुख स्वतंत्रता सेनानी थे लेकिन सिंध के दूसरे युवाओं की तरह ही उनके सपने भी चकनाचूर हो गए थे। 73 साल बाद भी हरदास को कल्याण कैंप में अपने परिवार के दिनों की यादें ताजा हैं।

लोग सेना की बैरकों में रहते थे जहां कोई कमरा नहीं था। कई बार वो बीच में कपड़ा डालकर पर्दा करते थे। वो याद करते हैं, ”सरकार ने राशन के लिए दाने दिए थे लेकिन कोई चक्की नहीं थी। हम अपना गेहूं पिसवाने के लिए कल्याण तक जाते थे।” इन बेहद मुश्किल परिस्थितियों में सिंध से आए ये लोग नई जिÞंदगी शुरू करना सीख रहे थे। उनकी संख्या 90 हजार को पार कर गई थी। सरकार ने उनके लिए नया शहर बसाने का फै़सला किया और शरणार्थियों को उसमें बसाया। 8अगस्त 1949 को गवर्नर जनरल सी। राजगोपालचारी ने नए शहर की आधारशिला रखी। उल्हास नदी के किनारे बसे इस शहर को उल्हासनगर नाम दिया गया। सिंधु घाटी के किनारे पनपी संस्कृति को उल्हास नदी के किनारे नया ठिकाना मिल गया।

भारत का ‘मिनी सिंध’
बंटवारे ने पंजाब और बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया था लेकिन पूरा सिंध पाकिस्तान के पास चला गया था। सिंधियों के पास भारत में अपनी कोई मातृभूमि नहीं थी ऐसे में सिंध प्रांत बनने का सवाल ही नहीं था। लेकिन उल्हासनगर में उन्हें अपना एक शहर मिल गया जहां उनकी संस्कृति और जबान आज भी फल फूल रही है। उल्हासनगर के सिंधी हिंदू धर्म के अनुयायी हैं। वो झूलेलाल की पूजा करते हैं। वो ‘चालिहो साहिब’ और ‘तीजादी छेनी चांद’ जैसे सिंधी त्यौहारों को पूरे जोश से मनाते हैं। उल्हासनगर में सिंध में रहने वाले सिख भी आकर बसे थे और यहाँ कई बड़े गुरुद्वारे भी हैं।

चर्चित यूट्यूब कलाकार आशीष चंचलानी कहते हैं, ”उल्हासनगर में हमारी जो विरासत है वो मेरे लिए बहुमूल्य है। सिंधी खाने पर अब खूब चर्चा होती है और लोग सिंधी व्यंजनों की तारीफ भी करते हैं।’ उल्हासनगर में सीएचएम कॉलेज और आरकेटी कॉलेज में कर्जत और खोपोली जैसे दूरस्थ स्थानों से भी युवा पढ़ने आते हैं। इन संस्थानों ने युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर दिए हैं। जिस तरह किसी पौधे को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगा दो तो वो वहाँ भी अपनी जड़ें बना लेता है, उल्हासनगर में सिंधी इसी तरह रचे बसे हैं। हालाँकि, सिंध से आने वाले सभी शरणार्थी सिंधी नहीं थे।

महाराष्ट्र में मराठी शरणार्थी
अगर आपसे कहा जाये कि महाराष्ट्र में मराठी शरणार्थी भी हैं तो शायद आपको विश्वास न हो लेकिन उल्हासनगर के कैंप चार इलाके में पहुंचकर आपको यकीन हो जाएगा। इसे ‘मराठा सेक्शन’ भी कहते हैं। ब्रितानी शासनकाल में सिंध एक समय बांबे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। कराची के कई कॉलेज मुंबई यूनिवर्सिटी के अधीन थे। ऐसे में दोनों समूहों के बीच खूब सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो रहा था। सिंध, खासकर कराची में बहुत से मराठी बस गए थे। इनमें से बहुत से गोवा और कोंकण क्षेत्र से थे। वरिष्ठ पत्रकार दिलीव मलवांकर के पिता भी ऐसे ही लोगों में से थे।

मलवांकर बताते हैं, ”पिताजी अपने चाचा के साथ कराची पोर्ट ट्रस्ट में काम करते थे। बंटवारे के बाद वो भारत आए थे। उन्हें मुंबई पोर्ट ट्रस्ट में नौकरी मिल गई थी और उल्हासनगर उनका घर बन गया था।” आजादी के बाद यहाँ आकर बसे मराठी लोगों ने अपनी अलग पहचान को बनाए रखा। सिंध महाराष्ट्रिया समाज और श्री कालिका कला मंडल जैसी उनकी संस्थाएं आज भी चल रही हैं। सिंध महाराष्ट्रिया समाज ने उल्हास विद्यालय और उल्हासगनर में गणेश उत्सव की शुरूआत की थी।

उल्हासनगर में सिंधी-मराठी तनाव
शरणार्थियों की परेशानियों तो एक जैसी थी लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि उनके एक दूसरे से अच्छे संबंध थे। महाराष्ट्र लौटे सिंधी और मराठी अपनी-अपनी संस्कृति और जबान को बचाने की जद्दोजहद चल रही थे और उनमें टकराव तो होना ही था। यह सिर्फ़ वैचारिक टकराव नहीं था बल्कि कई बार स्थिति दंगों और कर्फ़्यू तक पहुंच गई थी। यह टकराव उल्हासनगर के शुरूआती दिनों से ही शुरू हो गया था। सिंधी भाषी लोग इसका नाम सिंधुनगर चाहते थे। हरदास माखीजा कहते हैं कि इस मुद्दे को लेकर कई बार झगड़े और प्रदर्शन भी हुए।

दिलीप मलवांकर कहते हैं, ”सिंधी लोगों की संख्या ज्यादा थी और यहाँ सिंधी भाषा ही बोली जाती थी। अधिकारिक तौर पर इस भाषा का ही इस्तेमाल होता था। गैर सिंधी शरणार्थी जिनमें मराठी और गुजराती शामिल थे, इसे लेकर खुश नहीं थे और कई बार झगड़े हो जाते थे। लेकिन 1995-96 के बाद से हालात बदल गए हैं। अब कोई कड़वाहट नहीं है और सभी मिल-जुलकर रहते हैं।”

व्यापार में उल्हासनगर
जब सिंधी यहाँ पहुंचे तो उनके हाथ खाली थी। उन्हें सिर छिपाने के लिए ठिकाना तो मिल गया था लेकिन उनके सामने पेट भरने का बड़ा सवाल था। नानिक मंगलानी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”लोग लोकल ट्रेन में सामान बेचते थे। जो भी काम मिलता था कर लेते थे। मजदूरी भी करते थे, स्टेशन पर कुली का काम करते थे। वो दुकानों और फैक्ट्रियों में नौकरियाँ करते थे। वो वक्त ऐसा था कि बस पेट भरने की ही जद्दोजहद थी।”
यहाँ लोगों ने अचार और पापड़ बनाने शुरू कर दिए। वो घर में टॉफी और बिस्किट बनाते और फिर ट्रेनों और बस्तियों में बेचते थे। वो मुंबई में घर-घर जाकर सामान बेचते थे। फिर एक-एक करके सिंधी परिवारों ने नए-नए व्यापार करने शुरू कर दिए और उल्हासनगर में बाजार बसते गए। फर्नीचर बाजार, गजानंद मार्केट जहां कपड़े बिकते हैं और जापानी बाजार आदि। नायलॉन और प्लास्टिक से सामान बनाने वाली फैक्ट्रियां लग गईं। उल्हासनगर बढ़ता ही गया। डेनिम जींस के उत्पादन के मामले में ये देश के शीर्ष शहरों में शामिल हो गया। सेंचुरी रेयॉन जैसी कंपनियाँ यहीं से चल रहीं थीं।

व्यापार जगत में सिंधी समुदाय की कामयाबी अर्थशास्त्र में शोध का विषय हो सकती है। सीएचम कॉलेज उल्हासनगर की डॉक्टर मनजो ललवाली पाठक ने इस विषय पर एक शोध किया है। वो कहती हैं, ”बंटवारे से पहले भी सिंधी समुदाय अंदरूनी तौर पर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवास कर रहा था। प्रवास करके आए लोग अपने आप को आर्थिक तौर पर पुनर्स्थापित करने में प्रगतिशील और आक्रामक होते हैं। सिंधी इसका अपवाद नहीं थे।” सिंधी लोगों के व्यापार करने के तरीके की तरफ इशारा करते हुए वो कहती हैं, ”सिंधी लोग ग्राहक को भगवान मानते हैं। वो मुनाफा बढ़ाने से ज्यादा बिक्री बढ़ाने पर जोर देते हैं।”

एक उदाहरण देते हुए वो कहती हैं, ”ब्रैंडेड शर्ट बेच रही एक ऊंची दुकान एक ग्राहक को शर्ट बेचेगी और चार को ये बताएगी कि आप इसकी कीमत नहीं चुका सकते हैं। लेकिन उल्हासनगर की कैंप टू मार्केट में दुकानदारों की रणनीति अलग होती है। वो अलग-अलग ग्राहकों को अलग-अलग दाम बताते हैं। वो आपको इतना दाम बताएंगे जितना आप चुका पाएं। वो अधिक बिक्री करके मुनाफा कमाते हैं।”

नकल की राजधानी
व्यापार ने उल्हासनगर में कॉटेज इंडस्ट्री विकसित की जिसमें आस-पास के कस्बों के लोग भी काम करने आते हैं। लेकिन उल्हासनगर ‘नकली उत्पाद’ बनाने के लिए बदनाम भी हो गया। यहाँ तक कि इसे भारत का ‘डुप्लीकेट कैपिटल’ तक कहा जाने लगा। उल्हासनगर मुंबई में नकली सामान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द बन गया। ऐसा इस वजह से हुआ क्योंकि यहां के लोग महंगे ब्रैंड पर खर्च नहीं कर सकते थे। इसलिए वो कॉपी करते थे। पार्ले यहां परेल बन गया, मेड इन यूएसए (मेड इन उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन) नई पहचान बन गया।

माखीजा कहते हैं, ”भारत में पिछले 60-70 सालों बाजार में सस्ता चीनी सामान नहीं था। लेकिन लोगों को सस्ता विकल्प चाहिए था। इसलिए उल्हासनगर के सामान की खूब मांग थी।” जब व्यापार बढ़ने लगा तो लोगों ने अपने ब्रैंड स्थापित करने शुरू कर दिए और बड़ी कंपनियों को माल बेचना शुरू कर दिया। आपको यहाँ ऐसा डुप्लिकेट सामान भी मिल जाएगा जो बिलकुल ओरिजनल जैसा दिखता है। ये ‘फर्स्ट कॉपी उत्पादन’ बिना लाइसेंस के बनाए गए असली उत्पाद ही होते हैं। लेकिन उद्योग बढ़े तो अपराध भी बढ़ते ही गए। शहर चारों तरफ फैल रहा था। समस्याएं बढ़ने लगीं और अपराध होने लगे।

पप्लू कालानी और गैंगवॉर
साल 1990 के दशक में 16 साल की रिंकू पाटिल नाम की एक लड़की को उसके साथ पढ़ने वाले हरेश पटेल ने जला डाला। इस अपराध ने सिर्फ़ महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे भारत को हिला दिया था। लेकिन इस घटना से पहले ही उल्हासनगर आपराधिक गैंगों, फिरौती, गैंगवार और कत्ल की वारदातों के लिए बदनाम हो गया था। उल्हासनगर ठाणे जिÞले में आता है। वहाँ के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यहाँ के गैंगस्टर गोपाल राजवानी और पप्पू कालानी के बारे में बताते हैं।

वो बताते हैं, ”उल्हासनगर के गैंग मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़े थे। जब फिरौती की रकम को लेकर राजवानी और कालानी गैंगों में गैंगवॉर हुई तो पांच-छह महीनों में ही 10-15 लोग मारे गए। हर मंगलवार को कत्ल की कोई ना कोई वारदात हो जाती थी। पप्पू कालानी ने अपनी दहशत का साम्राज्य बना लिया था लेकिन उसे स्थानीय लोगों का समर्थन भी हासिल था।” पप्पू कालानी उल्हासनगर के एक समृद्ध परिवार में पैदा हुए थे, जिसका शराब और होटल का कारोबार था। उनके चाचा दूलीचंद कालानी कांग्रेस के नेता थे, बाद में पप्पू भी पार्टी में शामिल हो गए थे। स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक 1986 में 35 साल की उम्र में पप्पू नगरपालिका के अध्यक्ष और फिर विधायक बन गए थे।

जब सुधाकर राव नाइक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं के खिलाफ अभियान चलाया और पप्पू को पार्टी से निकाल दिया गया। वो टाडा में जेल भी गए लेकिन उनका प्रभाव इतना ज्यादा था कि वो जेल में रहते हुए भी चुनाव जीतते गए। बाद में वो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में भी गए। इन दिनों वो अपनी पत्नी ज्योति कालानी के जरिए राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। आज भले ही गैंगवॉर नहीं है लेकिन कालानी परिवार का अपना प्रभाव है। अपराध अब भी कम नहीं हुआ है।

समस्याओं का शहर
कभी सिंधी प्रवासियों की कॉलोनी रहा उल्हासनगर अब एक आगे बढ़ता शहर है। अब इसकी सीमाओं में तीन रेलवे स्टेशन हैं: उल्हासनगर, विट्ठलवाडीऔर शाहद। यहां कनेक्टिविटी है, कुछ इंफ्?ास्ट्रक्चर भी है लेकिन समस्याओें का पहाड़ भी है। प्रदूषण और अवैध निर्माण यहाँ सबसे बड़ी समस्याएं हैं। जब आप मुंबई-अंबरनाथ लोकल से उल्हासनगर पर उतरते हैं तो वालधुनी नदी आपका स्वागत करती है। अब यह कल्पना करना मुश्किल है कि कुछ दशक पहले लोग इस नदी का पानी पीते थे। आज यह गटर या नाला बन गई है जिसमें केमिकल फैक्ट्रियों का कचरा बहता है।

आप जब छोटे फुटब्रिज से मुख्य शहर की तरफ बढ़ते हैं तो इतनी बदबू आती है कि आपके हाथ अपने आप नाक पर चले जाते हैं। यहाँ की दूसरी सड़कों की कहानी भी इससे अलग नहीं है। अगर आप यहाँ पहली बार आए हैं तो यहाँ की बदबू आपको परेशान करती है। दिलीप मलवांकर कहते हैं, ”शहर के पास जमीन सीमित है ऐसे में लोगों ने ऊंची इमारतें बना दीं। राजनितिक सरपरस्ती में अवैध निर्माण चलता रहा। किसी ने इस स्थिति को बदलने के बारे में नहीं सोचा। अब लोग सिर्फ़ यही कर सकते हैं कि और नया अवैध निर्मण न होने दें।”

नई पीढ़ी और विदेश जाते लोग
उल्हासनगर बदल रहा है और इसकी प्रवासियों के शहर वाली पहचान भी बदल रही है। पुराने लोग शिकायत करते हैं कि सिंधी संस्कृति और जबान को नई पीढ़ी भूल रही है। नई पीढ़ी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ती है और हिंदी बोलती है। बहुत से लोग तो अब सिंधी पढ़ भी नहीं पाते हैं। हरदास माखीजा कहते हैं कि अगर पुरानी संस्कृति को बचाना है तो युवाओं को प्रयास करने होंगे। यूट्यूबर आशीष चंचलानी इससे सहमत हैं। वो कहते हैं कि डिजिटल पीढ़ी के पास परंपराओं, संस्कृति, विरासत या उनका परिवार कैसे यहाँ आया, यह सोचने का समय नहीं है।

वो कहते हैं, ”मुझे लगता है कि युवाओं को अपने घर के बुजुर्गों से बात करनी चाहिए और अपने इतिहास और विरासत को समझना चाहिए ताकि वो अगली पीढ़ी को इस बारे में बता सकें।” आशीष अपने यूट्यूब चैनल के जरिए इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं। उल्हासनगर के बहुत से युवा आज यह शहर छोड़कर दूसरी जगह जा रहे हैं। बहुत से सिंधी भी ऐसे हैं जो उल्हासनगर के साथ अपना नाम नहीं जोड़ना चाहते हैं। लेकिन आशीष के लिए उल्हासनगर ही उनका घर है। वो कहते हैं, ”उल्हासनगर हमेशा मेरा घर रहेगा। इस जगह की मेरे दिल में खास जगह है। मैं आज जो भी हूं, उल्हासनगर की वजह से ही हूं।”

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, Challenge News Paper

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