भारत में दुनियां के सभी मजहब पंथ के लोग बसते हैं जो अपनी आस्था तथा मान्यताओं के अनुसार ही अपने त्योहार पर्व एवं धार्मिक क्रियाकलाप करते हैं। पाकिस्तान के सिंध इलाके से बड़ी संख्या में सिंधी हिन्दुओं ने अपने धर्म के खातिर अपने व्यापार, व्यवसाय व जन्मभूमि का बंटवारा होने की वजह से छोड़कर भारत देश को अपनी कर्म भूमि चुना था तथा वे यहां आकर यही के हो गए। उनकी कई पीढ़ियां गुजर गई आज इनकी संख्या लाखों में हैं इन्हें सिंधी समुदाय के रूप में पहचाना जाता हैं। इनके आराध्य देव झूलेलाल जी हैं, जिन्हें जल के देव वरुण का अवतार माना जाता हैं। सिंध के राजा के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने तथा लोगों के धर्मांतरण को रोकने के लिए जनता की पुकार पर जलदेव झूलेलाल जी का जन्म चैत्र शुक्ल द्वितीया को हुआ था। अपने इष्ट के जन्म दिन को सिंधी समुदाय चेटीचंड पर्व के रूप में आज भी मनाता हैं। झूलेलाल जयंती के अवसर पर सम्पूर्ण भारत में पर्व धूमधाम से रीतिरिवाजों के अनुसार मनाया जाता हैं।
इतिहास में सिंधी समाज के बारे में उल्लेख मिलता हैं कि यह अधिकांश व्यापारी वर्ग था। तथा ये लोग समुद्र पार देशों में यात्राओं पर अक्सर जाया करते हैं। ऐसे में उनका अधिकतर समय समुद्र में ही गुजरता था, कई बार उनके भीषण संकटों तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता था। सफल समुद्री यात्रा के लिए तथा लूटपाट से बचने के लिए समुद्र के देव वरुण की पूजा कर उनका आशीर्वाद लिया जाता हैं। जल के देवता होने के कारण सिंधी समुदाय उन्हें अपना आराध्य देव मानता हैं। पिछले कई वर्षों से भारत में चेटीचंड का पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता हैं। अमरलाल व उडेरोलाला के रूप में आज भी समुद्र के समीप रहने वाले लोग भगवान झूलेलाल की पूजा-अर्चना करते हैं। उन्होंने धर्म, मानव कल्याण तथा आपसी भाईचारे के कई कार्य किए जिसके चलते उन्हें यह उच्च स्थान दिया गया हैं। सिंधी समाज का चेटीचंड विक्रम संवत का पवित्र एक पहला दिन हैं। चेटीचंड महोत्सव सिंधी समाज का बड़ा धार्मिक पर्व हैं जिन्हें सिंध के शासक मीरख शाह से सिंध की हिन्दू जनता को धर्मांतरण करने से रोका था। इन्हें हिन्दू व मुस्लिम समान रूप से पूजते हैं। लोग झूलेलाल जी से मन्नते करते हैं तथा चलिहा के दिन उनका आभार प्रकट करते हैं।
उनका जन्म सद्भावना और भाईचारा बढ़ाने के लिए हुआ था। पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत के अन्य प्रांतों में आकर बस गए हिंदुओं में झूलेलाल को पूजने का प्रचलन ज्यादा है। भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है। इसलिए लकड़ी का मंदिर बनाकर उसमें एक लोटे से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाते हैं, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है। सभी त्योहारों की तरह इस पर्व के पीछे भी पौराणिक कथाएं हैं। चेटीचंड को अवतारी युगपुरुष भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है।संवत 1007 में पाकिस्तान में सिंध प्रदेश के ठट्टा नगर में मिरखशाह नामक एक मुगल सम्राट राज्य करता था। उसने जुल्म करके हिंदू आदि धर्म के लोगों को इस्लाम स्वीकार करवाया। उसके जुल्मों से तंग आकर एक दिन सभी पुरुष, महिलाएं, बच्चे व बूढ़े सिंधु नदी के पास एकत्रित हुए और उन्होंने वहां भगवान का स्मरण किया। कड़ी तपस्या करने के बाद सभी भक्तजनों को मछली पर सवार एक अद्भुत आकृति दिखाई दी।
पल भर के बाद ही वह आकृति भक्तजनों की आंखों से ओझल हो गई। तभी आकाशवाणी हुई कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए मैं आज से ठीक सात दिन बाद श्रीरतनराय के घर में माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा। निश्चित समय पर रतनरायजी के घर एक सुंदर बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम उदयचंद रखा गया। मिरखशाह के कानों में जब उस बालक के जन्म की खबर पहुंची, तो वह अत्यंत विचलित हो गया। उसने इस बालक के मारने की सोची परंतु उसकी चाल सफल नहीं हो पाई।
तेजस्वी मुस्कान वाले बालक को देखकर उसके मंत्री दंग रह गए। तभी अचानक वह बालक वीर योद्धा के रूप में नीले घोड़े पर सवार होकर सामने खड़ा हो गया। अगले ही पल वह बालक विशाल मछली पर सवार दिखाई दिया। मंत्री ने घबराकर उनसे माफी मांगी।
बालक ने उस समय मंत्री को कहा कि वह अपने हाकिम को समझाए कि हिंदू-मुसलमान को एक ही समझे और अपनी प्रजा पर अत्याचार न करे, लेकिन मिरखशाह नहीं माना। तब भगवान झूलेलाल ने एक वीर सेना का संगठन किया और मिरखशाह को हरा दिया। मिरखशाह झूलेलाल की शरण में आने के कारण बच गया। भगवान झूलेलाल संवत 1020 भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्तर्धान हो गए। तब भगवान झूलेलाल ने एक वीर सेना का संगठन किया और मिरखशाह को हरा दिया। मिरखशाह झूलेलाल की शरण में आने के कारण बच गया। भगवान झूलेलाल संवत 1020 भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्तर्धान हो गए।
इस दिन श्रद्धालु संत झूलेलाल के मंदिर सुबह में जाकर उनका दर्शन करते हैं। वरुण देव का अवतार संत झूलेलाल को माने जाने की वजह से इस दिन भगवान वरुण की पूजा भी लोग करते हैं। बहिराणा साहिब की परंपरा को सिंधी समाज के लोगों द्वारा इस दिन नदी किनारे निभाया जाता है। पूजा के लिए आटे की लोई बना ली जाती है और उसमें सिंदूर, लौंग, फल, इलायची, दीपक और मिश्री आदि चीजें रखी जाती हैं। पूजा करके इन्हें नदी के जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।








